प्राणायाम क्या है – What is pranayama in Hindi

महर्षि पतंजलि द्वारा बताये गए अष्टांग योग (ASHTANGA YOGA) में प्राणायाम योग का चौथा महत्वपूर्ण भाग है|  प्राणायाम (breathing exercise) शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के दो शब्दों (प्राण + आयाम) से मिल कर हुई है| यहाँ प्राण का अर्थ है हमारी जीवन शक्ति या प्राण शक्ति और आयाम का अर्थ है नियंत्रित करना और प्रसार करना अर्थात प्राणायाम योग की एक ऐसी कला है जिसके द्वारा हम अपने शरीर की प्राण शक्ति को नियंत्रित करतें हैं और उसका प्रसार करतें हैं|

उम्मीद है, आपको प्राणायाम का अर्थ समझ आया होगा अब प्रश्न यह उठता है कि ये प्राणशक्ति क्या है और योग में इसको नियंत्रित करने और प्रसार करने को महत्व क्यों दिया गया है|

आधुनिक विज्ञान के अनुसार सांस लेने के दौरान हम वातावरण में उपस्थित ऑक्सीजन को अपने फेफड़े में भरते हैं और सांस छोड़ने के दौरान कॉर्बन डाइऑक्साइड और शरीर में उपस्थित अशुद्धियाँ वातावरण में छोड़ते हैं|

आयुर्वेद आधुनिक विज्ञान के इस शोध को नहीं नकारता लेकिन आयुर्वेद के अनुसार यह सांस जिसको प्राण या प्राणशक्ति भी कहा जाता है सांस लेने के दौरान हमारे शरीर में पाँच भागो में विभाजित हो जाती है|

इन पाँच भागों में प्राणशक्ति पर्याप्त मात्रा में पहुंचने के लिए यह आवश्यक है कि हम सही तरीके से गहरी और लम्बी सांस लें जिससे हमारे शरीर को पर्याप्त समय मिल सके और हमारा शरीर प्राणशक्ति को पाँचो भागों में आसानी से विभाजित कर सके|

हमारी सामान्य रूप से लिए जाने वाली सांस इतनी गहरी या लम्बी नहीं होती है कि सभी भागों को पर्याप्त प्राणशक्ति मिल सके, प्राणशक्ति के आभाव में उस भाग की (जहाँ प्राणशक्ति पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुँच रही) कार्यप्रणाली प्रभावित होती है और हम बीमार हो जाते हैं| 

प्राणायाम का अर्थ ही है प्राण या प्राणशक्ति का नियंत्रित प्रसार करना| नियमित प्राणायाम से इन पाँचो भागों को पर्याप्त मात्रा में प्राणशक्ति मिलती है जिससे ये सभी भाग अपने अपने कार्य सुचारु रूप से संचालित करते हैं और हमारा शरीर स्वस्थ रहता है|

प्राणायाम को और गहराई से जानने के लिए यह आवश्यक है कि हम उन पाँच भागों को भी जानें जहाँ हमारी प्राणशक्ति विभाजित हो करके पहुँचती है|

आयुर्वेद के अनुसार सांस लेने के बाद हमारी प्राणशक्ति आगे इन पाँच भागों में विभाजित हो जाती है

  • प्राण (Prana)
  • उदान (Udaan)
  • व्यान (Vyaan)
  • समान (Samaan)
  • अपान (Apaan)  

आइये, इन पाँचो भागों को एक एक करके समझतें हैं|

प्राण वायु – यह वायु मुख्यतः हमारे मुख में रहती है और अपने साथ जीवन देने वाली शक्ति को समाहित करती है| यह वायु हमारी फेफड़े और रक्त में भी रहती है| यदि किसी कारणवश प्राण वायु असंतुलित हो जाती है तो व्यक्ति को खाना निगलने में तकलीफ होती है साथ ही साथ फेफड़े से सम्भंधित बीमारियाँ, ह्रदय रोग, अत्यधिक हिचकियाँ आना जैसे बहुत सी समस्यायें देखनें को मिलती है|

उदान वायु – यह वायु हमारे गले में स्थित विशुद्धि ऊर्जा चक्र में निवास करती है और इस वायु का संबंध मस्तिष्क के क्रियाकलापों से होता है| यदि किसी कारण से हमारी उदान वायु असंतुलित हो जाती है तो हमें अवसाद, अत्यधिक विचार आना, कम याददाश्त होना, बहुत क्रोध आना, घबराहट होना, बेचैनी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है|

यह वायु हमारे तंत्रिका तंत्र के बीच संचार बनाने के लिए भी उत्तरदायी होती है| जिसका मतलब यह है कि यदि हमारी उदान वायु अनियंत्रित होती है तो हमें तंत्रिका तंत्र से सम्बन्धित बीमारियाँ हो सकती हैं|  

नियमित रूप से प्राणायाम करने वाले लोगों से आप प्रायः सुनेगें की उनका दिमाग पहले से शांत हो रहा है जिसका मुख्य कारण नियमित रूप से प्राणायाम करनें के फलस्वरूप उनके उदान वायु में संतुलन होना ही है|

बुढ़ापे में उम्र के साथ शरीर में उदान वायु असंतुलित हो जाती है जिसके कारण आप बुजुर्गों में अक्सर भूलने की बीमारी, अल्झाइमर (alzheimer), घबराहट, बेचैनी जैसे लक्षण देखेंगें| 

यदि आप इन बीमारियों से बचना चाहते हैं तो आपको अभी से नियमित रूप से प्राणायाम करना शुरू कर देना चाहिए|    

समान वायु: यह वायु या प्राणशक्ति हमारी नाभि में स्थित मणिपुर नाम के चक्र में रहती है जिसका मुख्य उद्देश्य पाचन तंत्र में विभिन्न अंगों के बीच समन्वय स्थापित करना है| यह वायु हमारी हड्ड़ियों को भी मजबूत और लचीली बनाती है और जोड़ों के बीच में उपस्थित द्रव्य को भी बनाये रखती है|

यदि किसी कारण से समान वायु में असन्तुलन पैदा हो जाता है तो हमारा पाचन तंत्र प्रभावित होता है साथ ही साथ हमें जोड़ों और हड्ड़ियों से सम्बंधित बीमारियाँ हो जाती हैं|

यदि आपको बुढ़ापे तक अपनी हड्डियां मजबूत रखनी है तो प्रत्येक सुबह नियमित रूप से प्राणायाम प्रारम्भ कर दें आपकी हड्डियां लम्बे समय तक सुरक्षित रहेंगीं|                  

अपान वायु:- अपान वायु हमारे आमाशय के नीचे और जाँघ के ऊपर सभी प्रकार के द्रव्य और पदार्थ की गति के लिए आवश्यक है| यह वायु हमारे पाचन तंत्र में भोजन को विभिन्न हिस्सों से गुजारती हुयी अंत में मल मूत्र के द्वारा बाहर कर देती है| अपान वायु के कारण ही हमें मल-मूत्र का दबाव महसूस होता है जिसको सामान्य भाषा में प्रेशर बनना कहा जाता है|

हमारे शुक्राणुओं की गति के लिए भी अपान वायु का संतुलित होना आवश्यक होता है यदि यह वायु सन्तुलित नहीं होगी तो हमारे शुक्राणुओं की गति भी गर्भधारण के लिए पर्याप्त नहीं होगी जिससे गर्भधारण में परेशानी का सामना करना पड़ सकता है|

इसके साथ अपान वायु गुर्दे, आँत से सम्भंधित क्रियाओं के लिए भी जिम्मेदार होती है यदि इन हिस्सों पर अपान वायु असन्तुलित हो जाती है तो हमें गुर्दों से, आँतों से, मूत्र से सम्बन्धित बिमारिओं और रोजाना कब्ज का सामना करना पड़ सकता है| 

आयुर्वेद में कपालभाति प्राणायाम अपान वायु को सन्तुलित रखनें के लिए सबसे उपयुक्त प्राणायाम बताया गया है|

व्यान वायु:- व्यानवायु हमारे पूरे शरीर में उपस्थित होती है और इसका निवास स्थान हमारा रक्त होता है| हमारे रक्त के द्वारा ही यह वायु हमारे पूरे शरीर में फैलती है| जिससे यह स्पष्ट होता है कि व्यान वायु का मुख्य उद्देश्य शरीर में विभिन्न अंगों तक पर्याप्त मात्रा में आवश्यक तत्वों को खून के साथ पहुँचाना होता है| 

यदि किसी कारण से व्यान वायु में असंतुलन आ जाता है तो शरीर के किसी भी भाग में आवश्यक तत्व की कमी, रक्तचाप, ह्रदय रोग जैसी बीमारियाँ हो सकती हैं|

व्यान वायु शरीर के क्षय को रोकती है और लम्बे समय तक त्वचा को जवान और चमकदार बनाये रखती है| नियमित रूप से प्राणायाम करने वाले लोगों के चेहरे में चमक होने का मुख्य कारण व्यान वायु का सन्तुलन ही है|                               

प्राणायाम इन्ही पाँच वायु या प्राण को पर्याप्त मात्रा में प्राणशक्ति पहुँचानें का कार्य करता है जिससे ये सभी वायु अपने अपने हिस्सों के कार्य को समन्वय के साथ सुचारु रूप से करती हैं और व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से जीवन पर्यन्त स्वस्थ रहता है|

प्राणायाम के प्रकार – Types of Pranayama

वैसे तो आयुर्वेद में बहुत प्रकार के प्राणायाम बताये गए हैं फिर भी सामान्य मनुष्य के लिए नीचे दिए गए प्राणायाम का नियमित अभ्यास अत्यंत लाभकारी होता है|    

प्राणायाम के फायदे – Benefits of Pranayama in Hindi

प्राणायाम एक ऐसी क्रिया है जो न तो केवल आपके शरीर और मस्तिष्क को ही स्वस्थ रखती है बल्कि इसके नियमित रूप से किये गए अभ्यास से मनुष्य की बौद्धिक और आध्यात्मिक शक्तियों का भी विकास होता है| 

आइये प्राणायाम से होने वाले कुछ शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक लाभों के बारे में जानतें हैं, पर याद रहे, प्राणायाम के फायदे (Pranayama ke fayde) केवल समुद्र की कुछ बूंदों के बराबर हैं सम्पूर्ण लाभ पाने के लिए आप को नियमित रूप से प्राणायाम करना पड़ेगा|

यदि आप नीचे दिए गये प्राणायाम के लाभ के प्रमाणिकता जाननें को इक्छुक हैं तो इन रिसर्च पेपर को पढ़ सकतें हैं –

https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC3734635/

https://pubmed.ncbi.nlm.nih.gov/21446363/

https://erj.ersjournals.com/content/54/suppl_63/PA577

https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC5793008/

https://www.jcdr.net/articles/PDF/1861/6%20-%203476.(A).pdf

प्राणायाम के शारीरिक फायदे  – Physical benefits of Pranayama

  • शरीर को लम्बे समय तक निरोगी और जवान बनाये रखता है|
  • आपकी दैनिक ऊर्जा को बढ़ाता है नींद के समय को कम करता है|
  • शरीर से आलस्य दूर करता है|
  • कब्ज,गुर्दे और मल-मूत्र सम्बंधित बीमारियों को दूर करता है|
  • ब्लडप्रेशर, दिल और फेफड़े की बीमारियाँ को दूर करता है और तो और शरीर में अच्छे कोलेस्ट्रॉल को जमा करता है और बुरे कोलेस्ट्रॉल को कम करता है|
  • सांस को गहरी और धीमी करता है|
  • शरीर के विभिन्न अंगों की क्रियाओं में सुधार करता है|
  • शरीर के अंगों में समन्वय स्थापित करता है|
  • शरीर में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ाता है|
  • प्रतिरक्षा प्रणाली में सुधार करता है|
  • त्रिदोष (वात, पित्त और कफ) को नियंत्रित करता है|         

प्राणायाम के मानसिक फायदे – Mental Benefits of Pranayama

  • किसी भी प्रकार का नशा छोड़ने में मदद करता है| 
  • दिमाग की एकाग्रता और याददाश्त को बढ़ाता है|
  • दिमाग को शांत करता है|
  • इच्छा शक्ति और संकल्प शक्ति को बढ़ाता है|
  • तनाव, अवसाद, बेचैनी को कम करता है|
  • क्रोध, दुःख और निराशा को कम करता है|
  • स्वप्नदोष को दूर करता है|
  • मस्तिष्क में सद्गुणों को बढ़ाता है और रजस तथा तमस गुण को कम करता है|
  • आपकी सेक्स की ऊर्जा को उर्ध्वगामी बनाता है मतलब सेक्स जैसी असीमित ऊर्जा को दिमाग की ओर गति करवाता है जिससे व्यक्ति पहले से ज्यादा रचनात्मक और बुद्धिमान बनता है साथ ही साथ सेक्स की ऊर्जा ऊपर उठने के कारण वासना भी कम परेशान करती है|        

प्राणायाम के आध्यात्मिक फायदे – Spiritual Benefits of Pranayama

  • आध्यात्म की तरफ रुझान बढ़ाता है|
  • मन में भक्ति भाव पैदा करता है|
  • शरीर और मन को ध्यान के लिए तैयार करता है|
  • शरीर में उपस्थित सभी ऊर्जा चक्रों को खोलता है और उनकी ऊर्जा को स्वच्छ करता है|
  • आपके ब्रम्हरंध्र (सिर में उपस्थित चक्र) को खोलता है जिससे आप वैश्विक शक्ति (Cosmic Energy) को ग्रहण कर सकें|

प्राणायाम की सावधानियाँ  – Precautions for Pranayama

  • प्राणायाम हमेशा बिल्कुल खाली पेट करना चाहिए (आप प्राणायाम के 2 घंटे पहले पानी भी ना पियें हों)
  • प्राणायाम हमेशा खुली हवा, साफ और शांत स्थान पर करना चाहिए यदि आसपास पेड़ पौधें हों तो प्राणायाम का प्रभाव और बढ़ जाता है|
  • यदि आपको पहले से कोई बीमारी है तो डॉक्टर से परामर्श कर लें ऐसी परिस्थितियों अपने मन से कोई भी प्राणायाम करना शुरू ना कर दें अन्यथा आपको विपरीत परिणाम मिल सकते हैं|
  • प्राणायाम करते समय अपने शरीर का कोई भी भाग सीधे दीवार या जमीन से ना छुवायें नहीं तो प्राणायाम के दौरान बनने वाली सम्पूर्ण ऊर्जा धरती में चली जाएगी और आपको पूरा लाभ नहीं मिलेगा इन परिस्थियों में तकिये और चटाई का इस्तेमाल अवश्य करें|
  • गर्भवती महिलाओं को डॉक्टर से परामर्श के बाद ही प्राणायाम करना चाहिये|
  • प्राणायाम करने के बाद 30 से 45 मिनट तक कुछ भी न खायें या पीयें|
  • प्राणायाम करने के तुरन्त बाद न नहाएं|
  • प्राणायाम करने की अवधि को थोड़ा थोड़ा करके बढ़ायें|
  • 12 साल से कम उम्र के बच्चे से प्राणायाम न करायें|
  • प्राणायाम के दौरान आँखें बंद रखें और सांस या नाक की छोर पर ध्यान टिकायें इससे आपको जल्दी लाभ मिलेगा|
  • प्राणायाम करने के दौरान अपनी पीठ को बिलकुल सीधी रखें यदि संभव नहीं है तो किसी चीज का सहारा ले सकतें हैं|
  • शुरुआत में आपको बहुत छोटे परिणाम देखने को मिलेंगें| आपको इससे निराश नहीं होना चाहिए प्राणायाम के देखने योग्य परिणाम कम से कम 2 से 3 महीने के नियमित अभ्यास से ही मिलेंगें| इसलिए धैर्य और अनुशासन के साथ कम से कम 3 महीने तक प्राणायाम का अभ्यास करते रहें|

प्राणायाम से संबधित प्रश्न – People also ask 

प्राणायाम करने का सही क्रम क्या है?


सबसे पहले कपालभाति प्राणायाम करें, फिर अनुलोम विलोम, भ्रामरी और उज्जई प्राणायाम करें| बाकी दूसरे प्राणायाम जैसे शीतली, शीतकारी, चंद्र भेदन,सूर्य भेदन आदि को चिकित्सक से परामर्श लेनें के बाद करें|     

प्राणायाम कहाँ करना चाहिये?


प्राणायाम को खुली जगह करना चाहिए जहाँ ताजी हवा आती हो, आपका स्थान साफ़ सुथरा और शांत होना चाहिए यदि आप किसी पेड़ या पौधे के पास प्राणायाम करते हैं तो यह बहुत अच्छा रहेगा|   

सबसे पहले कौन सा प्राणायाम करना चाहिए?


सबसे पहले आपको कपालभाति प्राणायाम करना चाहिए जिससे सब तरह के ब्लॉकेज खुल जाते हैं और बाकी दूसरे प्राणायाम करने में आसानी होती है|

सबसे अच्छा कौन सा प्राणायाम है?


सभी प्राणायाम अच्छे हैं सभी की अपनी अलग-अलग विशेषतायें हैं इसलिए यह कह पाना मुश्किल है कि सबसे अच्छा प्राणायाम कौन सा है| फिर भी कपालभाति, अनुलोम  विलोम, भ्रामरी, उज्जई प्राणायाम सर्वश्रेष्ठ मानें गयें हैं|

प्राणायाम कब करना चाहिये?


प्राणायाम करने का सबसे अच्छा समय भोर का होता है यदि भोर में उठ पाना संभव नहीं है तो जितनी जल्दी हो सके सुबह उतनी जल्दी प्राणायाम कर लें|
       

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यदि आपके पास कोई सुधार या सुझाव है तो कमेंट में हमें बतायें हमें बहुत खुशी होगी|

तो आप प्राणायाम करना कब शुरू कर रहें हैं?

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