अनुलोम विलोम प्राणायाम – Anulom vilom pranayama in Hindi

हमारे शरीर में कुल 72000 नाड़ियाँ हैं जिन्हें अंग्रेजी भाषा में एनर्जी चैनल्स (Energy Channels) कहा जाता है| यह नाड़ियाँ हमारे पूरे शरीर में फैली हुयीं हैं और इनका कार्य शरीर में प्राणशक्ति का प्रवाह करना है|

हमारी आधुनिक जीवनशैली में गलत खानपान, तनाव, योग (Yoga) और प्राणायाम (Breathing excersice) की कमी के कारण हमारी यह नाड़ियाँ अवरुद्ध (ब्लॉक) हो जाती हैं जिसके कारण प्राण का प्रवाह हमारे शरीर में सही तरह से नही हो पाता और प्राणशक्ति के आभाव में हम बीमार रहनें लगते हैं|

इसीलिये हमारे प्राचीन ऋषियों ने नाड़ी शोधन प्राणायाम (Nadi Sodhan Pranayama) का आविष्कार किया जिसे आज के आधुनिक युग में अनुलोम विलोम प्राणायाम के नाम से भी जाना जाता है|

इस प्राणायाम के नाम से ही स्पष्ट है नाड़ी को शुद्ध करने वाला अर्थात नाड़ी शोधन या अनुलोम-विलोम प्राणायाम एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से हम अपने शरीर में उपस्थित अवरोध (ब्लॉकेज) के खोल सकते हैं जिससे प्राण का प्रवाह पूरे शरीर में आसानी से होने लगता है और प्राणशक्ति मनुष्य की सभी बिमारिओं को पूरी तरह समाप्त कर देती है| 

यह तो अनुलोम विलोम प्राणायाम (Alternate Nostril Breathing excercise) का साधारण परिचय हो गया अब आईये जानते हैं कि वैज्ञानिक रूप से यह नाड़ी शोधन प्राणायाम हमारी ऊर्जा नाड़ियों के अवरोधों को किस प्रकार मिटाती है|

अनुलोम विलोम क्या है – What is Anulom Vilom Pranayam in Hindi

Anulom Vilom Pranayama

72000 नाड़ियों में सबसे प्रमुख तीन नाड़ियाँ हैं जिन्हें इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ी कहा जाता है| इड़ा नाड़ी जिसको चंद्र नाड़ी भी कहा जाता है यह हमारी रीढ़ की हड्डी के बाएं तरफ स्थित होती है जो रीढ़ की हड्डी के निचले भाग से शुरू हो कर नाक के बाएं नथुने में समाप्त होती है|  

इसी प्रकार पिंगला नाड़ी जिसे सूर्य नाड़ी भी कहा जाता है, हमारी रीढ़ की हड्डी के निचले भाग से शुरू हो कर रीढ़ की हड्डी के दाएं तरफ से होती हुयी नाक के दाएं नथुने में समाप्त होती है|

इन दोनों नाड़ियों के मध्य में हमारी शुषुम्ना नाड़ी उपस्थित होती है जो रीढ़ की हड्डी के निचले भाग से शुरू हो कर रीढ़ की हड्डी के मध्य से गुजरती हुयी अंत में ब्रम्हरंध्र (सिर के बीच में स्तिथ ऊर्जा चक्र) में समाप्त होती है|

शुषुम्ना नाड़ी साधारणतया सुसुप्ता अवस्था में रहती है जिसको योग, प्राणायाम और ध्यान द्वारा जागृत किया जाता है| इसी सुषुम्ना नाड़ी के पथ पर हमारे शरीर के सातों ऊर्जा चक्र स्थित होतें हैं|

जब शुषुम्ना नाड़ी जागृत होती है तो इस नाड़ी से प्राण का प्रवाह होनें लगता है जिससे हमारे सभी ऊर्जा चक्र एक एक करके जागृत होनें लगतें हैं और मनुष्य आध्यात्म की चरम सीमा तक पहुँच जाता है|

परन्तु शुषुम्ना नाड़ी के जागरण के लिए यह आवश्यक है कि हमारी इड़ा और पिंगला नाड़ी परस्पर संतुलन में रहें यदि कोई नाड़ी ज्यादा प्रभावी होगी तो मनुष्य में उससे सम्भंधित गुण भी ज्यादा प्रभावी होगें|

उदाहरण के तौर पर यदि मनुष्य की इड़ा नाड़ी (चंद्र नाड़ी) ज्यादा प्रभावी होगी तो मनुष्य में चंद्र से सम्बंधित गुण जैसे शीतलता जरुरत से ज्यादा ही प्रभावी होगी | जिससे मनुष्य में आलस्य, सोचने समझने की क्षमता में कमी, निर्णय लेनें की क्षमता में कमी, जोश में कमी, उत्साह में कमी, उदासीनता आदि जैसे लक्षण दिखाई देतें हैं|

इसी प्रकार पिंगला नाड़ी (सूर्य नाड़ी)  के अधिक प्रभावी होनें के कारण मनुष्य में सूर्य से सम्बंधित गुण बढ़ जातें हैं और ऐसा मनुष्य जरूरत से ज्यादा जोश,क्रोध, उत्साह, बिना सोचे समझे निर्णय लेने वाला और जरुरत से ज्यादा क्रियाशील होता है|

इसलिए इड़ा और पिंगला नाड़ी के बीच संतुलन होना बहुत आवश्यक है| संतुलन की अवस्था में मनुष्य में सूर्य और चंद्र दोनों से सम्बंधित गुण समान मात्रा में होतें हैं|

संतुलन में सूर्य नाड़ी के कारण मनुष्य में उत्साह रहता है तो चंद्र नाड़ी के कारण वह उत्साह में भी शांत रहता है और धैर्य नही खोता| यदि सूर्य नाड़ी के कारण मनुष्य को क्रोध आता भी है तो चंद्र नाड़ी के शीतलता के कारण उसको क्रोध पर नियंत्रण भी रहता है|

ऐसा मनुष्य कठिन से कठिन परिस्थियों को धैर्य और उत्साह के साथ आसानी से पार लेता है| 

हमारी एक नाड़ी कम क्रियाशील होनें का मुख्य कारण उसमें अवरोध के वजह से प्राणशक्ति की कमी का होना है नाड़ी शोधन प्राणायाम में हम अपनी स्वास द्वारा अवरोध को मिटाते हैं जिससे दोनों नाड़ियों में सन्तुलन स्थापित हो जाता है| 

आईये जानतें हैं कि अनुलोम विलोम प्राणायाम के फायदे क्या हैं और इसका अधिकतम लाभ पाने के लिए हमें अनुलोम विलोम प्राणायाम किस प्रकार करना चाहिए और क्या सावधानियाँ रखनी चाहिए| 

अनुलोम विलोम के लाभ – Benefits of anulom vilom in hindi

  • रक्तचाप और मधुमेह जैसी बीमारियाँ पूरी तरीके से ठीक हो जातीं हैं|  
  • अनुलोम-विलोम प्राणायाम के नियमित अभ्यास से वजन कम करनें में मदद मिलती है|
  • इसके निरंतर अभ्यास से तनाव, क्रोध, अवसाद, बेचैनी जैसी नकारात्मक मानसिक अवस्थाओं से छुटकारा मिलता है|
  • मनुष्य में धैर्य, संकल्प शक्ति, इच्छा शक्ति, रचनात्मकता और विश्लेषण करनें की क्षमता बढ़ती है|     
  • नियमित अभ्यास से सकारात्मकता बढ़ती है|
  • वात, पित्त और कफ (त्रिदोष) में संतुलन पैदा होता है|
  • विद्याथियों की बौद्धिक क्षमता बढ़ती है और याददाश्त में वृद्धि होती है| 
  • हृदय और फेफड़े से सम्बंधित बीमारियाँ दूर होती हैं| 
  • माइग्रेन और साइनस जैसे रोगों से निजात मिलता है| 
  • मन शान्त रहता है और एकाग्रता बढ़ानें में मदद करता है|
  • शरीर की विशुद्धियाँ दूर होतीं हैं और त्वचा में चमक आती है|
  • मनुष्य का स्वसन तंत्र, पाचन तंत्र और तंत्रिका तंत्र मजबूत होता है| 
  • नाड़ियों के सभी अवरोध समाप्त हो जातें हैं जिससे प्राणशक्ति पूरे शरीर में प्रवाहित होती है| 
  • इड़ा और पिंगला के संतुलन के कारण शुषुम्ना नाड़ी जागृत होती है|

अनुलोम विलोम प्राणायाम कैसे करें – How to do anulom vilom pranayama

अनुलोम विलोम प्राणायाम सही तरीके से करनें के लिए आपको नीचे दिए गए चरणों को क्रमबद्ध पालन करना चाहिए –  

Step #1. कोई स्वच्छ और शांत स्थान का चयन करें जहाँ ताज़ी हवा आती हो यदि आसपास पेड़ पौधें हों तो बहुत अच्छा रहेगा| 

Step #2. धरती पर चटाई या योगा मैट बिछा लें और पद्मासन, सुखासन या वज्रासन में बैठ जाएं| यदि जमीन पर बैठना संभव नहीं है तो लकड़ी की कुर्सी का भी इस्तेमाल कर सकतें हैं|

Step #3.  पीठ को सीधी रखें यदि पीठ सीधा रख पाना संभव नहीं है तो तकिये के साथ दिवार का सहारा ले सकतें हैं|

Step #4. शरीर को बिलकुल ढीला छोड़ दें मन को शांत करें और चित्त को वर्तमान में ले आईये| 

Step #5. अब अपने दायें हाथ के अंगूठे से नाक के दायें नथुने को बंद करें (बाहर से दबायें) और बायें नथुने से सहज तरीके से धीरे धीरे गहरी स्वास अपने फेफड़े में भरें|  

Step #6. स्वास पूरी तरह भर जाने के बाद अगर आपकी इच्छा होतो अपनी क्षमता के अनुसार स्वास को रोक सकतें हैं नहीं तो अपनी कनिष्का और अनामिका उंगलिओं से बायें नथुने को बंद करके (बाहर से दबायें) दायें नथुने से फेफड़े में भरी स्वास अँगूठा हटा कर धीरे धीरे करके निकाल दें| 

Step #7.  अब इसी क्रम में दायें नथुने से धीरे धीरे गहरी स्वास अपने फेफड़े में भरें और यथाशक्ति स्वास को रोक कर रखें (यदि स्वास रोक पाना संभव नहीं है तो कोई परेशानी की बात नही है)| 

Step #8. पूरी तरह से स्वास भर जानें के बाद अपने अंगूठे से दायें नथुने को दबा दें और बायें नथुने से अनामिका और कनिष्का उंगलिओं को हटा कर स्वास धीरे धीरे सहज रूप से बायें नथुने से छोड़ दें|

इस प्रकार अनुलोम विलोम प्राणायाम का एक सेट पूरा होता है शुरुआत में आप एक बार में 10 से 15 सेट करें और फिर धीरे धीरे अपनी अवधि बढ़ाते जाएँ|  

परन्तु अनुलोम विलोम प्राणायाम का अधिकतम लाभ पानें के लिए आपको कुछ सावधानियों का ध्यान रखना होगा अन्यथा आपको इसके फायदे से ज्यादा विपरीत परिणाम देखनें को मिल सकते हैं| 

अनुलोम विलोम प्राणायाम की सावधानियाँ – Precautions of Anulom Vilom Pranayama

  • प्राणायाम हमेशा खाली पेट करें (प्राणायाम करने के 2 घंटे पहले ही पानी पी लें) प्राणायाम के समय पेट बिलकुल खाली होना चाहिये|  
  • प्राणायाम करते समय यह ध्यान रखें की शरीर का कोई भाग धरती के सम्पर्क में ना हो नहीं तो आपकी सम्पूर्ण ऊर्जा धरती में चली जाएगी|  
  • गर्भवती महिलायें प्राणायाम डॉक्टर से परामर्श करनें के बाद ही करें|
  • यदि आपको पहले से कोई बीमारि है तो प्राणायाम करने के पहले डॉक्टर से परामर्श अवश्य ले लें|
  • प्राणायाम करने के बाद 30 से 45 मिनट तक कुछ भी खायें या पियें नही| 
  • प्राणायाम हमेशा खुली जगह पर ही करें बंद कमरे में किया गया प्राणायाम लाभकारी नही होता|
  • प्राणायाम करने के तुरंत बाद स्नान न करें| 
  • अधिकतम लाभ पानें के लिए खान पान और जीवनशैली का भी ध्यान रखें|  
  • शास्त्रों के अनुसार प्राणायाम करनें का सबसे उचित समय सुबह का है यदि सुबह वक्त निकाल पाना संभव नहीं है तो आप शाम को भी प्राणायाम कर सकतें हैं|
  • प्राणायाम करने की अवधि धीरे धीरे बढ़ायें|

अनुलोम विलोम प्राणायाम के नुकसान – Side effects of Anulom vilom pranayam

अनुलोम विलोम प्राणायाम को यदि योग गुरु के निरीक्षण में सही तरीके से करतें हैं तो इसका कोई नुकसान नही है| लेकिन यदि आप कोई गर्भवती महिला हैं या किसी पुराने रोग से पीड़ित हैं तो डॉक्टर से परामर्श लेनें के बाद ही प्राणायाम करना प्रारम्भ करें| 

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तो आप अनुलोम विलोम प्राणायाम करना कब शुरू कर रहें हैं?

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धन्यवाद।       

 

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